
लोकतंत्र में मौन नहीं, जवाबदेही सबसे बड़ा दायित्व है
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र की सबसे सटीक परिभाषा देते हुए कहा था— “लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन है।” अर्थात लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता में निहित होती है। वही सरकार चुनती है, वही उसे वैधता प्रदान करती है और अंततः शासन का उद्देश्य भी जनता का कल्याण ही होता है।
आज प्रश्न केवल तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे राजनीतिक व्यंग्य या सोनम वांगचुक के आंदोलन का नहीं है। मूल प्रश्न लोकतंत्र में जवाबदेही का है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। केवल पद प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं होता; उस पद से जुड़े निर्णयों और उनके परिणामों के प्रति जवाबदेह होना भी उतना ही आवश्यक है। यदि किसी नीति, निर्णय या व्यवस्था का अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी जिम्मेदारी कौन स्वीकार करेगा।
इसी संदर्भ में कई दिनों से जारी आंदोलन और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल ने इस प्रश्न को और अधिक गंभीर बना दिया है। उनका आंदोलन केवल किसी एक मांग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शासन की संवेदनशीलता, संवाद और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व पर भी सवाल खड़े कर रहा है।वर्तमान सरकार स्वयं को संवेदनशील, पारदर्शी और “सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत पर चलने वाली सरकार बताती रही है। साथ ही भारतीय जनता पार्टी स्वयं को विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भी कहती है। ऐसे में यदि समाज का कोई वर्ग सरकार से प्रश्न पूछता है, असहमति दर्ज करता है या अपनी बात रखना चाहता है, तो लोकतांत्रिक परंपरा यही अपेक्षा करती है कि उसका उत्तर संवाद के माध्यम से दिया जाए।
लोकतंत्र में मौन हमेशा समाधान नहीं होता।राजनीति में यह स्वीकार किया जाता है कि किसी भी मुद्दे पर अलग-अलग तरह के नैरेटिव बनते हैं। ऐसे नैरेटिव का उत्तर तथ्यों, संवाद और पारदर्शिता से दिया जाता है, न कि केवल चुप्पी से। क्योंकि जब सत्ता मौन रहती है, तब उस मौन की अनेक व्याख्याएँ होने लगती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ और अपने दृष्टिकोण के अनुसार उसका अर्थ निकालता है, जिससे भ्रम और अविश्वास दोनों बढ़ सकते हैं।
सोनम वांगचुक के आंदोलन ने भी एक ऐसे विषय को, जिसे पहले कुछ लोग केवल राजनीतिक व्यंग्य या सोशल मीडिया की चर्चा मान रहे थे, अब व्यापक जनभावनाओं से जोड़ दिया है। समाज का एक बड़ा वर्ग उनके प्रति अपनी संवेदना व्यक्त कर रहा है और सरकार से स्पष्ट संवाद की अपेक्षा कर रहा है।यह भी सच है कि किसी सरकार के प्रति जनता की राय एक जैसी नहीं होती। कोई समर्थन करता है, कोई विरोध करता है और अनेक लोग बीच का रास्ता अपनाते हैं। फिर भी लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सरकार जनभावनाओं को सुने, उठ रहे प्रश्नों का उत्तर दे और संवाद की परंपरा को जीवित रखे।
लोकतंत्र में आलोचना को शत्रुता नहीं, बल्कि जनमत का एक महत्वपूर्ण स्वर माना जाना चाहिए।अंततः लोकतंत्र केवल चुनाव जीत लेने का नाम नहीं है। उसकी वास्तविक आत्मा जनता के प्रति जवाबदेही, पारदर्शिता और सतत संवाद में निहित है। जब नागरिक प्रश्न पूछते हैं, तब सरकार का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि विश्वास बनाए रखना भी होता है। क्योंकि लोकतंत्र में मौन से अधिक प्रभावशाली उत्तर संवाद होता है, और जवाबदेही ही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान है।

